चुनाव तिथियों पर बेकार की आपत्ति

“असदुद्दीन ओवैसी का विचार स्तुत्य है कि चुनाव तिथियों पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया है कि इन तिथियों में मुसमान पहले से अधिक मतदान करेंगे। देश को इसी तरह के सकारात्मक चिंतन की जरूरत है।”

सियाराम पांडेय ‘शांत’ 14.03.2019

चुनाव आयोग की घोषणा के साथ ही चुनाव तिथियों को लेकर राजनीतिक घमासान भी आरंभ हो गया है। कुछ राजनीतिक दलों ने चुनाव तिथियों के औचित्य पर सवाल उठाया है। इसे एक वर्ग को चुनाव में भाग लेने से रोकने की साजिश कहा है। ऐतराज संक्रामक रोग की तरह है, जो पैदा तो छोटी जगह, कोने-अतरे में होता है लेकिन पलक झपकते ही अपना रूप व्यापक कर लेता है।

नसीहत ठीक नहीं

लखनऊ में मुस्लिम धर्मगुरु फिरंगी महली ने चुनाव तिथियों को लेकर ऐतराज जाहिर किया है। उनका कहना है कि इस साल रमजान का महीना 5 मई से आरंभ हो रहा है। ऐसे में कुछ चुनाव तिथियां रमजान के बीच में पड़ रही हैं। इससे मुस्लिम मतदाताओं को वोट डालने में परेशानी हो सकती है। इसलिए उक्त तिथियों में परिवर्तन करना चाहिए। आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता संजय सिंह ने आरोप लगाया है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार चाहती ही नहीं है कि मुसलमान वोट डालें। कुछ अन्य विपक्षी दलों ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किये हैं। चुनाव में इस तरह के विचार उठते रहते हैं। लेकिन इस तरह के सवाल उठाने वालों को यह भी सोचना होगा कि जिन तिथियों का मुद्दा वे उठा रहे हैं, उन तिथियों में दूसरे धर्म के भी पर्व-त्यौहार पड़ रहे होंगे। उन धर्मों के धर्मगुरुओं में से शायद किसी ने भी चुनाव तिथि को लेकर आपत्ति नहीं की क्योंकि उनके लिए देश धर्म से बड़ा है।

जिन दिनों में चुनाव अधिसूचना से लेकर मतगणना तक होनी है, उन दिनों में किसानों के पास बहुत सारे काम होते हैं लेकिन देश के किसी भी किसान या उनके संगठन ने कभी चुनाव तिथियों को लेकर आपत्ति नहीं की। यहां तो कुछ राजनीतिक दल दो-एक दिन देर से आचार संहिता लागू होने को लेकर चुनाव आयोग से नाराज हैं और उस पर आरोपों की तोप दाग रहे हैं और कहां रमजान के बहाने चुनाव तिथियों को टालने की दलीलें दी जा रही हैं। इस तरह का विरोधाभास आखिर कब तक चलेगा? चुनाव के दौरान हिन्दुओं के कई पर्व-त्योहार भी हैं। 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती और 17 को महावीर जयंती है। इन तिथियों की अहमियत भी किसी से कम नहीं है। ऐसे में आस्था के नाम पर तिथियों में परिवर्तन की नसीहत किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है।

सकारात्मक चिंतन की जरूरत

असदुद्दीन ओवैसी का विचार स्तुत्य है कि चुनाव तिथियों पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया है कि इन तिथियों में मुसमान पहले से अधिक मतदान करेंगे। देश को इसी तरह के सकारात्मक चिंतन की जरूरत है।

3 जून 2019 को 16वीं लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। 17वीं लोकसभा का गठन होना है तो इन्हीं तिथियों में चुनाव कराना होगा। रमजान एक माह का होता है। रमजान में चुनाव न कराएं तो जाहिर सी बात है कि चुनाव 5 जून के बाद कराना होगा। यह तो धर्मसंकट ही नहीं, संवैधानिक संकट भी है। देश धर्म से नहीं, संविधान से चलता है। इसलिए भी चुनाव की तिथियों में किसी भी तरह का मीन-मेख उचित नहीं है। कैराना में जब ईवीएम खराब हो गयी थी तो मुस्लिम मतदाताओं ने बूथ पर ही रोजा इफ्तार किया था। इसलिए चुनाव तिथि पर सवाल उठाने की बजाय राजनीतिक दल और धर्मगुरु इस पूरे मामले को मतदाताओं के विवेक पर छोड़ दें, यही लोकहित का तकाजा भी है।