मुकाबला नरेन्द्र मोदी बनाम अन्य

“गत पांच वर्षों में देश ने नयी ऊंचाइयों को छुआ है। उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ की गयी एयर स्ट्राइक के बाद जनता को यह भरोसा हुआ कि नरेन्द्र मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है।”

जयकृष्ण गौड़ 14.03.2019

चुनावी महाभारत प्रारंभ हो गया है। कहा जाता है कि युद्ध के परिणाम अनिश्चित होते हैं। युद्ध का ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, इस बारे में कोई निश्चित नहीं होता। महाभारत के युद्ध में लोगों को यह विश्वास रहा कि जहां श्रीकृष्ण हैं, वहां विजय निश्चित है। इसी प्रकार शिवाजी के बारे में मान्यता थी कि शिवाजी हर संकट और कठिन चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं। जहां शिवाजी हैं वहां विजय है। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।

मिलावटी सरकारों का युग

1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से मुक्त कराने के बाद हुए चुनाव में इंदिराजी को सफलता मिली। इंदिराजी की हत्या से उपजी सहानुभूति का लाभ कांग्रेस को मिला और राजीव गांधी को लोकसभा में प्रचंड बहुमत मिला। 1975 में इंदिराजी ने आपातकाल लगाया था। जनता का आपातकाल के प्रति गुस्सा था। इससे जनता ने 1977 के चुनाव में 30 वर्षों से सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस को धूल चटा दिया। इसके बाद बोफोर्स दलाली कांड का मुद्दा उभरा और वर्ष 1989 में राजीव गांधी की सरकार का पतन हो गया। इसके बाद राष्ट्रीय मोर्चा बना। वी.पी. सिंह के पास 141 सीटें थी, फिर भी श्राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। यह भी परस्पर विरोधी विचार और रीति का गठबंधन था। आडवाणीजी की रामरथ यात्रा को रोकने और उनको गिरफ्तार करने से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। इस कारण वी.पी. सिंह सरकार का पतन हो गया। गठजोड़ सरकार के दो वर्ष में दो प्रधानमंत्री बने। एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल। देश में मजबूत सरकार नहीं होने से मिलावटी सरकारों का युग प्रारंभ हो गया। बार-बार प्रधानमंत्री बदले। इससे देश में अस्थिरता का वातावरण रहा। देश की सुरक्षा के सामने नए-नए संकट पैदा होते रहे।

नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व

अटलजी की सरकार भी छह वर्ष तक चली। अटलजी के कुशल नेतृत्व से गठबंधन की बाध्यता के बावजूद सरकार ने राष्ट्रहित में कई निर्णय लिए। अटलजी की सरकार की रीति-नीति भी ठीक रही। प्रधानमंत्री सड़क योजना का पूरे देश में जाल बिछाया। उसे लोग याद करते हैं। राजनीतिक नेतृत्व की यह भी मान्यता रही कि गठबंधन सरकारों का युग है। इसी प्रकार लंगड़ी-लूली सरकार चलती रहेगी। लेकिन भारत की जनता की सूझबूझए राजनीतिक नेतृत्व से आगे की रहती है। 2014 के चुनाव में पहली बार भारत की जनता ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को पसंद किया और भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार को स्पष्ट बहुमत मिला। इसे राजनीतिक क्रांति ही कहा जाएगा क्योंकि भारत की जनता मिलावटी सरकारों से ऊब चुकी थी।

केंद्र में कांग्रेस की मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी लेकिन रिमोट कंट्रोल से चलने के कारण इस सरकार के अंतिम दो वर्ष घोटालों के रहे। कांग्रेस के भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों ने नया राष्ट्रवादी विकल्प चुना। अभी तक सेकुलर नीति का बखान होता रहा। कांग्रेस, समाजवादियों ने यही राग अलापा। जनता को लगा कि हिन्दू विरोधी सेकुलर नीति की गुफा से बाहर निकलकर राष्ट्रवादी विचारों को कसौटी पर कसा जाए। राष्ट्रवादी अवधारणा से ही सबका साथ-सबके विकास के विचार से नरेन्द्र मोदी सरकार ने काम प्रारंभ किया।

गत पांच वर्षों में देश ने नयी ऊंचाइयों को छुआ है। उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ की गयी एयर स्ट्राइक के बाद जनता को यह भरोसा हुआ कि नरेन्द्र मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है। अब सवाल यह है कि देश को स्थिर और विकास की ऊंचाई पर ले जाने वाले नरेन्द्र मोदी का मुकाबला है राहुल गांधी, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी आदि के गठबंधन से। कांग्रेस का चरित्र सबके सामने है। करीब 55 वर्षों तक कांग्रेस का शासन रहा। यह भी सब जानते हैं कि चंद्रशेखर, चरण सिंह, देवेगौड़ा और गुजराल की सरकारों के साथ कांग्रेस ने धोखेबाजी की। इस मिलावटी गठबंधन के नेतृत्व को यह समझना होगा कि कांग्रेस उनका साथ नहीं दे सकती। सोनिया किसी भी तरह अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहती हैं। सवाल यह है कि क्या गठबंधन के नेता राहुल का नेतृत्व स्वीकार करेंगे। क्या जनता इस पर भरोसा करेगी। बहरहाल, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा कि भविष्य का भारत किसकी अगुवाई में चलेगा।